पूर्व धर्माधिकारी ने शंखचूड़ और माता तुलसी से जुड़ी पौराणिक कथा का किया उल्लेख, धाम की धार्मिक मर्यादा बनाए रखने पर भी दिया जोर।

देहरादून/बदरीनाथ। विश्व प्रसिद्ध बदरीनाथ धाम में शंख नहीं बजाए जाने की परंपरा को लेकर पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज के बयान के बाद चर्चा शुरू हो गई है। मंत्री ने शंख के हड्डी से बने होने का कारण बताया है। वहीं, बदरीनाथ धाम के पूर्व धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल ने इस परंपरा को माता तुलसी और शंखचूड़ से जुड़ी धार्मिक मान्यता से जोड़ा है।
भुवन चंद्र उनियाल के अनुसार, बदरीनाथ धाम में शंख को पूजा में रखा जाता है, लेकिन उसे बजाया नहीं जाता। उन्होंने बताया कि इसके पीछे माता तुलसी के वृंदा स्वरूप और शंखचूड़ से संबंधित पौराणिक कथा प्रचलित है।
माता तुलसी और शंखचूड़ से जुड़ी है मान्यता
पूर्व धर्माधिकारी ने बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार माता तुलसी ने वृंदा के रूप में बदरीनाथ क्षेत्र में तपस्या की थी। उनका विवाह शंखचूड़ से हुआ था, जो पूर्व जन्म में गोप था। बदरीनाथ क्षेत्र में तपस्या के दौरान दोनों की भेंट हुई और उनका पुनः विवाह संपन्न हुआ।
उन्होंने बताया कि पौराणिक कथा के अनुसार मृत्यु के बाद शंखचूड़ शंख में विलीन हो गया। बदरीनाथ धाम में भगवती तुलसी को लक्ष्मी स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि उन्हें वृंदा स्वरूप की स्मृति न हो, इसलिए यहां शंख नहीं बजाया जाता।
धाम की धार्मिक मर्यादा बनाए रखने पर जोर
पूर्व धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल ने बदरीनाथ धाम में होने वाले आयोजनों को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि बदरीनाथ शांति, साधना और तपस्या का स्थान है। यहां ऐसे धार्मिक आयोजन होने चाहिए जो धाम की परंपरा और आध्यात्मिक स्वरूप के अनुरूप हों।
उनके अनुसार, धाम में भजन, कीर्तन और भागवत कथा जैसे आयोजनों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने हाल में आयोजित कुछ कार्यक्रमों को धाम की गरिमा के अनुकूल नहीं बताते हुए धार्मिक मर्यादा बनाए रखने की आवश्यकता जताई।
इस पूरे मामले में शंख नहीं बजाने की परंपरा को लेकर दो अलग-अलग व्याख्याएं सामने आई हैं। एक ओर पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज का बयान है, वहीं दूसरी ओर पूर्व धर्माधिकारी ने इसके पीछे प्रचलित धार्मिक मान्यता का उल्लेख किया है।
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