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कायस्थों का खान-पान1 : कैसे सजती है लालाओं की रसोई, क्या पकता है उसमें

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हाइलाइट्स

कायस्थों की रसोई के खाने अगर मुगल दस्तरख्वान का फ्यूजन हैं तो बाद में ब्रिटिश राज की सोहबत भी
कायस्थों ने मुगलों, अंग्रेजों और आंचलिक खानों को इनोवेट किया और कुछ खुद विकसित किया

ये बात कई साल पहले की है. बनारस में कायस्थों के मोहल्ले से निकलते हुए हर घर के बाहर पकते मीट की गंध नथुनों में भर रही थी. साथ चल रहे कजन ने मेरी ओर देखते हुए तपाक से कहा, “ललवन के मुहल्लवां से जब संडे में निकलबा त पता लग जाई कि हर घर में मटन पकत बा.” ये वाकई सच है.

बनारस के अर्दली बाजार में काफी बड़ी संख्या में कायस्थ रहते हैं. रविवार को जब यहां के मोहल्लों से दोपहर में निकलें तो हर घर से आती गंघ बता देगी कि अंदर क्या पक रहा है. ये हालत पूर्वी उत्तर प्रदेश के तकरीबन उन सभी जगहों की है, जहां कायस्थ अच्छी खासी तादाद में रहते हैं.

हकीकत यही है. उत्तर भारत में अब भी अगर आप किसी कायस्थ के घर संडे में जाएं तो किचन में मीट जरूर पकता मिल सकता है. पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में कायस्थों को लाला भी बोला जाता है. देशभर में फैले कायस्थों की खास पहचान का एक हिस्सा उनका खान-पान भी है. संडे में जब कायस्थों के घर जब मीट बनता है तो अमूमन इसे बनाने का जिम्मा पुरुष ज्यादा संभालते हैं. मैने अपने तमाम रिश्तेदारों को बखूबी ये काम करते देखा है.

मैं ऐसे घर का हूं, जहां मेरे पिता पक्ष में कोई मीट नहीं खाता. मां पक्ष में नाना पक्के सत्संगी लेकिन नानी को खूब शौक था. जौनपुर के ननिहाल में हर संडे नानी की रसोई हमेशा मुख्य रसोई से परे खिसक जाती थी, बर्तन भी अलग होते थे. क्योंकि उस दिन वो मीट बनाती थीं. वो इसे कैसे बनाती थीं. वो कितना लजीज होता था, ये किस्सा आगे. जिसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश के कायस्थों की रसोई और खान-पान के बारे में चर्चा करूंगा.

वैसे तो कायस्थों के खानपान पर कई किताबें भी आई हैं, उसमें एक खास किताब “मिसेज एलसीज टेबल” है. इसकी लेखिका हैं अनूठी विशाल.इसने बखूबी उन तमाम व्यंजनों की बात की है, जो कायस्थ रसोई से बनकर उनके खाने की टेबल पर सजती है. यहां ये भी साफ कर दूं कि आमतौर पर मैं जिन व्यंजनों का जिक्र करूंगा, वो आमतौर पर कायस्थों ने मुगलों, अंग्रेजों और आंचलिक खानों से लेकर खुद कुछ इनोवेट किया और कुछ अपने तरीके से विकसित किया, उसे खास जायकों में ढाल दिया.

कायस्थों की रसोई में मुगल खानों का फ्यूजन खूब हुआ, जिसे उन्होंने अपने तरीकों से समृद्ध किया. (फाइल फोटो)

कायस्थों की रसोई कैसे फली-फूली
माना जाता है कि भारत में लजीज खानों की खास परंपरा कायस्थों के किचन से निकली है. कायस्थों में तमाम तरह सरनेम हैं. खान-पान की असली परंपरा और रवायतों में माथुर कायस्थों की देन ज्यादा है. खाने को लेकर उन्होंने खूब इनोवेशन किया. कायस्थों की रसोई के खाने अगर मुगल दस्तरख्वान का फ्यूजन हैं तो बाद में ब्रिटिश राज में उनकी अंग्रेजों के साथ शोहबत भी. हालांकि पूर्वी उत्तर प्रदेश खासकर इलाहाबाद, लखनऊ, बनारस, गोरखपुर, आजमगढ़ और जौनपुर में रहने वाले श्रीवास्तव भी खुद को कुछ कम नहीं मानते.

मेरे एक बॉस अक्सर मीटिंग कायस्थों के लाजवाब खानपान पर चर्चा करते थे. उनका मानना था कि कायस्थों को अपने बेहतरीन खानपान के कारण होटल जरूर चलाना चाहिए. उनका कहना होता था कि कायस्थ अगर खानपान की पुरानी परंपरा को जीवित कर लें तो उनसे बेहतर ये काम कोई कर ही नहीं सकता.

मुगलों के साथ काम करते हुए खानों को और समृद्ध किया
वैसे कायस्थों का इतिहास पहली और दूसरी सदी से मिलता है, शुरुआती सदियों में उन्होंने कश्मीर से लेकर कई राज्यों या रियासतों पर राज भी किया लेकिन इतिहास की मुख्यधारा में उन्हें वो जगह मिल नहीं पाई. वैसे कायस्थों की जमात मुख्य तौर पर तब चर्चा में ज्यादा आई जब मुगल भारत आए. तब फारसी में लिखा-पढ़ी, चकबंदी और अदालती कामकाज के नए तौरतरीके शुरू हुए. कायस्थों ने फटाफट फारसी सीखी और मुगल बादशाहों के प्रशासन, वित्त महकमों और अदालतों में मुलाजिम और अधिकारी बन गए.

क्या खाते-पीते थे मुगल
लेखक अशोक कुमार वर्मा की एक किताब है, “कायस्थों की सामाजिक पृष्ठभूमि”. वो कहती है, “जब मुगल भारत आए तो कायस्थ मुस्लिमों की तरह रहने लगे. उनके खाने के तौरतरीके भी मुस्लिमों की तरह हो गए. वो बीफ छोड़कर सबकुछ खाते थे. मुगलों के भोजन का आनंद लेते थे. मदिरासेवी थे.” 14वीं सदी में भारत आए मोरक्कन यात्री इब्ने बबूता ने अपने यात्रा वृत्तांत यानि रिह्‌ला में लिखा, “मुगलों में वाइन को लेकर खास आकर्षण था. अकबर के बारे में कहा जाता है कि वो शाकाहारी और शराब से दूर रहने वाला शासक था. कभी-कभार ही मीट का सेवन करता था. औरंगजेब ने तो शराब सेवन के खिलाफ कानून ही पास कर दिया था. हालांकि उसकी कुंवारी बहन जहांआरा बेगम खूब वाइन पीती थी. जो विदेशों से भी उसके पास पहुंचती थी.

कायस्थ हमेशा खाने-पीने के शौकीन रहे हैं
जमाना बदल गया है. खानपान और पीने-पिलाने की रवायतें बदल रही हैं. हरिवंशराय बच्चन दशद्वार से सोपान तक में लिख गए, ” मेरे खून में तो मेरी सात पुश्तों के कारण हाला भरी पड़ी है, बेशक मैने कभी हाथ तक नहीं लगाया.”.कायस्थ हमेशा से खाने-पीने के शौकीन रहे हैं. लेकिन ये सब भी उन्होंने एक स्टाइल के साथ किया. आज भी अगर पुराने कायस्थ परिवारों से बात करिए या उन परिवारों से ताल्लुक रखने वालों से बात करिए तो वो बताएंगे कि किस तरह कायस्थों की कोठियों में बेहतरीन खानपान, गीत-संगीत और शास्त्रीय सुरों की महफिलें सजा करती थीं. जिस तरह बंगालियों के बारे में माना जाता है कि हर बंगाली घर में आपको अच्छा खाने-पीने, गाने और पढ़ने वाले लोग जरूर मिल जाएंगे, कुछ वैसा ही कायस्थों को लेकर कहा जाता रहा है.

ओहो, भरवां व्यंजनों का क्या लजीज अंदाज 
भरवों और तमाम तरह के पराठों का जो अंदाज आप अब खानपान में देखते हैं, वो मुगलों की पाकशाला से जरूर निकले लेकिन उसका असली भारतीयकरण कायस्थों ने किया. मुगल जब भारत आए तो उन्हें यहां जो मूल सब्जियां मिलीं, उसमें करेला, लौकी, तोरई, परवल और बैंगन जैसी सब्जियां थीं. उनके मुख्य खानसामा ने करेला और परवल को दस्तरख्वान के लिए चुना, क्योंकि उन्हें लगा कि ये मुगल बादशाह और उनके परिवार को पसंद आएगी. लेकिन उन्होंने एक काम और किया. इन दोनों सब्जियों के ऊपर चीरा लगाकर उन्होंने इसे अंदर से खाली किया. भुना मीट कीमा डालकर इसे तंदूर में पकाया.

बेशक ये जायका लाजवाब था. कायस्थों ने इसे अपने तरीके से पकाया. उन्होंने करेला, बैंगन, परवल में सौंफ, लौंग, इलायची, आजवाइन, जीरे और धनिया जैसे मसालों और प्याज का मिश्रण भूनकर भरा. कुछ दशक पहले तक किसी और घर में पूरे खड़े मसालें मिलें या नहीं मिलें लेकिन कायस्थों के घरों में ये अलग-अलग बरनियों या छोटे डिब्बों में मौजूद रहते थे. उन्हें हर मसाले की खासियतों का अंदाज था.

सिलबट्टे पर पिसाई और फिर हल्के हल्के भुनाई
बात भरवों की हो रही है. खड़े मसालों को प्याज और लहसुन के साथ सिलबट्टे पर पीसा जाता था. बने हुए पेस्ट को कढ़ाई पर भुना जाता था. फिर इसे करेला, बैंगन, परवल, आलू, मिर्च आदि में अंदर भरकर कड़ाही में तेल के साथ देर तक फ्राई किया जाता था. कड़ाही इस तरह ढकी होती थी कि भुनी हुई सब्जियों से निकल रही फ्यूम्स उन्हीं में जज्ब होती रहे. आंच मध्यम होती थी कि वो जले नहीं. बीच-बीच में इतनी मुलायमित के साथ उस पर कलछुल चलाया जाता था कि हर ओर आंच प्रापर लगती रहे. आज भी अगर आप कायस्थ रसोई में तरीके से बने इन भरवां व्यंजनों को चखेंगे तो वाह-वाह कर उठेंगे. बैंगन के भरवां का अंदाज ये होता है कि जीभ पर आते ही ये नमकीन माधुर्य के साथ घुलने सा लगेगा. एक नजाकत देगा और फिर इसका भरवा मसाला मिश्रण एक डांस सा करता लगेगा. परवल का भरवां बाहर से थोड़ा पपड़ीनुमा होगा तो अंदर से लजीज मसालेदार. करेले का भरवां बाहर से थोड़ा नरम थोड़ा कड़वा और अंदर से मस्त-मस्त.

दरअसल देश में पहली बार भरवों की शुरुआत इसी अंदाज में कायस्थों के किचन में हुई. हर मसाले के अपने चिकित्सीय मायने भी होते थे. यहां तक मुगलों के बारे में भी कहा गया है कि मुगल पाकशाला का मुख्य खानसामा हमेशा अगर किसी नए व्यंजन की तैयारी करता था तो शाही वैद्य से मसालों के बारे में हमेशा राय-मश्विरा जरूर कर लेता था. (जारी रहेगा)

Tags: Community kitchen, Food, Food Recipe, Prayagraj cuisine

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